संगीत परिचय - गत किसे कहते है | मसीतखानी और रजाखानी गत में क्या अंतर है | DEFINATION MASITKHANI AND RAJAKHANI GAT - Shekhar Music Academy
ALL SONG'S LYRICS IN HINDI & ENG.
!! इन्सान होना भाग्य की बात है और संगीतकार होना सौभाग्य की बात है !!
संगीत- गायन, वादन, सुर, लय, ताल, थाट, राग, सरगम, पकड़, आलाप, बंदिश, सरगम गीत, INDIAN & WESTERN PATTERNS

IF YOU WANT TO PLAY ANY MUSICAL INSTRUMENTS SPECIALY KEYBOARD AND HARMONIUM THEN YOU ARE AT THE RIGHT PLACE AND CLICK ON SHEKHAR MUSIC ACADEMY TO LEARN FROM VIDEOS ON MY YOUTUBE CHANNEL "SHEKHAR MUSIC ACADEMY"

18 January 2022

संगीत परिचय - गत किसे कहते है | मसीतखानी और रजाखानी गत में क्या अंतर है | DEFINATION MASITKHANI AND RAJAKHANI GAT






गत किसे कहते हैं ?

गत किसे कहते हैं ? गत का मतलब – विभिन्न प्रकार के वाद्यों पर बजायी जाने वाली ताल में बंधी हुई रचनाएँ गत कहकर पुकारी जाती हैं । गत के प्रत्येक स्वर पर मिजराब के बोल होते हैं ।

जैसे – गग रे सासा नि रे ग ग ग दिर दा दिर दा रा दा दा रा


गत के प्रकार:

Types of Gat in Music ? गत के कितने प्रकार हैं ? – मुख्य रूप से गत दो प्रकार की होती हैं :-

1. मसीतखानी गत किसे कहते हैं ?

1. मसीतखानी गत मसीतखानी गत की वंश परम्परा के द्वारा इस नवीन गत का आविष्कार हुआ । इस गत का नामकरण इसके आविष्कारक के आधार पर हुआ , जिनका नाम मसीत खाँ था । मसीत खाँ के पिता का नाम फिरोज खाँ था । कुछ विद्वानों द्वारा इसे ‘ फिरोजखानी गत ‘ के नाम से भी जाना जाता है ।

• ये गते विलम्बित लय प्रधान होती हैं तथा खाली की तीन मात्राओं के पश्चात् बारहवीं मात्रा से शुरू हो जाती हैं । इसके बोल दिर दा दिर दा रा दा दा रा , दिर दा दिर दारा दा दा रा होते हैं । मसीतखानी गत हेतु मुखड़ा 5 मात्राओं में होना अति आवश्यक होता है । 12 वीं मात्रा से बन्दिश प्रारम्भ की जाती हैं ।


2. रजाखानी गत किसे कहते हैं ?

मसीतखानी गत विलम्बित लय प्रधान होती है और रजाखानी गत द्रुत लय में बजाई जाती है । .

• लय के अनुसार , ‘ रजाखानी गत ‘ मसीतखानी के बिल्कुल विपरीत होती है । इसकी प्रकृति गम्भीर न होकर चंचल होती है । वादक को इस गत में पूर्णरूपेण स्वतन्त्रता प्राप्त होती है , वह अपनी इच्छा के अनुसार तान व तोड़े बजाने की पूर्ण स्वतन्त्रता रखता है । रजाखानी गत के बोल इस प्रकार होते हैं 
– दिर दिर दाऽर दाउर दा , आदि ।

– पूर्णरूपेण स्वतन्त्रता प्राप्त होने के कारण वादक द्वारा इसमें अपनी पूरी तैयारी दिखाने का अवसर प्राप्त होता है ।

– जिस प्रकार मसीतखानी गत को ‘ पश्चिमी बाज ‘ कहा जाता है , उसी प्रकार , रजाखानी गत को ‘ पूर्वी बाज ‘ के नाम से जाना जाता है ।

– इसके आविष्कारक के रूप में रजा खाँ साहब का नाम लिया जाता है , इसमें निश्चित बोलों का नहीं , अपितु आवश्यकतानुसार विभिन्न बोलों का प्रयोग किया जाता है । इसमें तैयारी के साथ तोड़े बजाए जाते हैं और अन्त में झाला के विभिन्न प्रकार बजाकर गत को समाप्त किया जाता है । अत : इसे ‘ लखनऊ बाज ‘ के नाम से भी जाना जाता है।





।। इन्सान होना भाग्य की बात है और संगीतकार होना सौभाग्य की बात है।।
PLEASE LIKE AND SUBSCRIBE MY YOUTUBE CHANNEL : SHEKHAR TRICKY

............THE END............

No comments:

Post a Comment

Please Comment Your Questions: