
राग - भैरवी, थाट - भैरवी
स्वर लिपि
स्वर : रिषभ, गंधार, धैवत और निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर।
जाति : सम्पूर्ण - सम्पूर्ण
थाट : भैरवी
वादी : मध्यम (म)
संवादी : षड्ज (स)
समय : दिन का प्रथम प्रहर
विश्रांति स्थान : सा; म; प; - सा'; प; म;
मुख्य अंग : ग_ स रे_ स ; ग_ म प ; ध_ म ध_ नि_ सं ; रें_ सं ध_ प ग_ म रे_ स
विश्रांति स्थान : सा; म; प; - सा'; प; म;
मुख्य अंग : ग_ स रे_ स ; ग_ म प ; ध_ म ध_ नि_ सं ; रें_ सं ध_ प ग_ म रे_ स
आरोह : सा रे_ग_ म प ध_ नि_ सं
अवरोह : सं नि_ ध_ प म ग_ रे_ स
पकड ः म ग_, स रे स, ध़_ नि़_ स
विशेष -
विशेष -
Bhairavi is a Hindustani Classical heptatonic raga of Bhairavi thaat. In Western musical terms, raga Bhairavi employs the notes of the Phrygian mode, one of the traditional European church modes.
👉यह भैरवी थाट का आश्रय राग है। हालांकि इस राग का गाने का समय प्रातःकाल है पर इस राग को गाकर महफिल समाप्त करने की परंपरा प्रचार में है। आजकल इस राग में बारह स्वरों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने का चलन बढ़ गया है जिसमें कलाकार कई रागों के अंगों का प्रदर्शन करते हैं। यह राग भाव-अभिव्यक्ति के लिए बहुत अनुकूल तथा प्रभावकारी है। इसके पूर्वांग में करुण तथा शोक रस की अनुभूति होती है। और जैसे ही पूर्वार्ध और उत्तरार्ध का मिलाप होता है तो इस राग की वृत्ति उल्हसित हो जाती है।
ऐसा कौन संगीत मर्मज्ञ अथवा संगीत रसिक होगा जिसने राग भैरवी का नाम ना सुना हो या इसके स्वरों को ना सुना हो। इस राग के इतने लचीले, भावपूर्ण तथा रसग्राही स्वर हैं की श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इस राग का विस्तार मध्य तथा तार सप्तक में किया जाता है। इस राग में जब शुद्ध रिषभ का प्रयोग किया जाता है तो इसे सिंधु-भैरवी कहा जाता है।
इस राग की प्रकृति चंचल है अतः इसमें ख्याल नही गाये जाते। इसमें भक्ति तथा श्रृंगार रस की अनुभूति भरपूर होती है अतः इसमें भजन, ठुमरी, टप्पा, ग़ज़ल, आदि प्रकार गाये जाते हैं। यह स्वर संगतियाँ राग भैरवी का रूप दर्शाती हैं -
रे१ ग१ रे१ ग१ सा रे१ सा ; ग१ म प ; प ध१ प ; प ध१ नि१ ध१ म ; ध१ प ग१ म ; प म ग१ म रे१ रे१ सा ; ,ध१ सा ; सा ग१ म प ; प ध१ प ; म म ; ग१ रे१ सा ; सा ग१ रे१ म ग१ ; सा ग१ प म ग१ सा रे१ सा ; ,नि१ रे१ ,नि१ ,ध१ ,नि१ ,ध१ ,प ,प ,ध१ ,नि१ ,ध१ सा;
ऐसा कौन संगीत मर्मज्ञ अथवा संगीत रसिक होगा जिसने राग भैरवी का नाम ना सुना हो या इसके स्वरों को ना सुना हो। इस राग के इतने लचीले, भावपूर्ण तथा रसग्राही स्वर हैं की श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इस राग का विस्तार मध्य तथा तार सप्तक में किया जाता है। इस राग में जब शुद्ध रिषभ का प्रयोग किया जाता है तो इसे सिंधु-भैरवी कहा जाता है।
इस राग की प्रकृति चंचल है अतः इसमें ख्याल नही गाये जाते। इसमें भक्ति तथा श्रृंगार रस की अनुभूति भरपूर होती है अतः इसमें भजन, ठुमरी, टप्पा, ग़ज़ल, आदि प्रकार गाये जाते हैं। यह स्वर संगतियाँ राग भैरवी का रूप दर्शाती हैं -
रे१ ग१ रे१ ग१ सा रे१ सा ; ग१ म प ; प ध१ प ; प ध१ नि१ ध१ म ; ध१ प ग१ म ; प म ग१ म रे१ रे१ सा ; ,ध१ सा ; सा ग१ म प ; प ध१ प ; म म ; ग१ रे१ सा ; सा ग१ रे१ म ग१ ; सा ग१ प म ग१ सा रे१ सा ; ,नि१ रे१ ,नि१ ,ध१ ,नि१ ,ध१ ,प ,प ,ध१ ,नि१ ,ध१ सा;
बंदिशः
सध_, पध_, मप, ग_म, नि_ध_, ध_, सरे_ग_म .....x2
ग_रे_सस, ध़_नि़_, सरे_, नि़_स, मम, ग_ग_, रे_स, ....x2
नि़_स, ग_म, ध_म, ध_नि_, सं, संसं ग_रे_सं,
संसं, नि_नि_, ध_ध_, पप, मम, ग_रे_रे_स
राग - भैरवी आधारित गाने
👉रातों को उठ उठ कर जिनके लिए रोते हैं।
👉कलयुग के अवतारी हमें तेरा सहारा है। ( CLICK HERE VIDEO)
👉मोहे भूल गए सांवरिया
👉ये मालिक तेरे बंदे हम
NOTE : ALL _ SYMBOL OF UNDER CORE IS A कोमल स्वर, BECAUSE IN THIS RAAG THERE ARE FOUR KOMAL SWAR.
LEARN FROM VIDEOS : CLICK HERE
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............THE END............


बहुत सुन्दर जानकारी प्राप्त हुई
ReplyDeleteNice sir
ReplyDeleteधन्यवाद
ReplyDeletesome rabindrasangeet like "Amra Bnedhechhi Kasher Guchchho" are written in the mentioned rag (i.e Bhairavi)
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