भारतीय संगीत : राग
भारतीय शास्त्रीय संगीत में रागों की कोई सटीक गिनती नहीं है। एक बार सवाई गंधर्व संगीत समारोह में उस्ताद विलायत खान ने अपना प्रदर्शन शुरू करने से पहले कहा - "हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में लगभग 4 लाख राग हैं। उनमें से कई दोहराए गए हैं, लेकिन अलग-अलग नाम हैं।"
संगीत में राग क्या महत्व है?
शास्त्रीय संगीत में गायन, वादन में सबसे ज्यादा रागों का महत्व है। इन रागों में भी जातियां होती है। जिन रागों में 5 स्वरों का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति कहते हैं। जिनमें 6 स्वरों का प्रयोग हो वह षाड़व और 7 स्वरों का प्रयोग होने वाले राग को संपूर्ण जाति कहा जाता है।
भारतीय संगीत में रागो की संख्या -
भारतीय संगीत में रागो कि संख्या के बारे में कुछ कह पाना अत्यंत कठिन विषय है, क्योंकि भारतीय संगीत में अनेक राग है, जिनका वर्णन कर पाना अत्यंत दुर्लभ है क्योकिं कहा जाता है कि लगभग 4 लाख से भी अधिक राग है। जिसे याद रखना बहुत कठिन है। अतः रागो की उत्पत्ति थाट से होती है भारतीय संगीत में थाट की संख्या 10 है। 10 थाटो के स्वरो को मिलाकर 4 लाख राग कि उत्तपत्ति हुई है।
कहा जाता है कि एक थाट में लगभग 4484 राग होते है।
1 थाट = 4484 राग
राग और थाट
'राग' शब्द संस्कृत की 'रंज्' धातु से बना है। रंज् का अर्थ है रंगना। जिस तरह एक चित्रकार तस्वीर में रंग भरकर उसे सुंदर बनाता है, उसी तरह संगीतज्ञ मन और शरीर को संगीत के सुरों से रंगता ही तो हैं। रंग में रंग जाना मुहावरे का अर्थ ही है कि सब कुछ भुलाकर मगन हो जाना या लीन हो जाना।
'थाट' प्रत्येक थाट में अधिक से अधिक और कम से कम सात स्वर प्रयोग किये जाने चाहिए। इसका कारण यह है कि अगर थाट सम्पूर्ण (सात स्वर वाला) नहीं रहता है तो किस प्रकार उससे सम्पूर्ण रागों की उत्पत्ति मानी जाएगी?
थाट सम्पूर्ण होने के साथ-साथ उसके स्वर स्वाभाविक क्रम से होने चाहिए। उदाहरण के लिए सा के बाद रे, रे के बाद ग व म, म के बाद प, ध और नी आने ही चाहिए। यह बात दूसरी है कि थाट में किसी स्वर का शुद्ध रूप न प्रयोग किया जाए, बल्कि विकृत रूप प्रयोग किया जाए। उदाहरणार्थ भैरव थाट में कोमल रे–ध और कल्याण थाट में तीव्र म स्वर प्रयोग किये जाते हैं। किसी थाट में आरोह-अवरोह दोनों का होना आवश्यक नहीं है, क्योंकि प्रत्येक थाट के आरोह और अवरोह में कोई अन्तर नहीं होता। केवल आरोह या अवरोह को देखन से ही यह ज्ञात हो जाता है कि वह कौन सा थाट है। थाट गाया-बजाया नहीं जाता। अत: उसमें वादी-सम्वादी, पकड़, आलाप-तान आदि की आवश्यकता नहीं होती।
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